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यह प्रवचन 26 जनवरी 1958 को भागलपुर जिले के त्रिमोहन में आयोजित युवा सम्मेलन में पुनर्जागरण क्लब के उद्घाटन के दौरान दिया गया था। (लेखक ने 27 जनवरी 1958 को पुनर्जागरण क्लब, या पुनर्जागरण यूनिवर्सल की स्थापना की थी।)

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Description

परम पुरुष [सर्वोच्च चेतना] मेरे पिता हैं, परम प्रकृति [सर्वोच्च क्रियाशील सिद्धांत] मेरी माता हैं, और यह ब्रह्मांड मेरा जन्मस्थान है। हम सभी इस ब्रह्मांड के नागरिक हैं। यह ब्रह्मांड वृहद ब्रह्मांडीय मन का विचार प्रक्षेपण है, और ब्रह्मांडीय कल्पना प्रवाह के बहिर्मुखी और अंतर्मुखी चरणों में ही सभी प्राणियों का सृजन, पालन और संहार निरंतर होता रहता है।

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